नाम की महिमा
स्वामी सत्यानंदजी महाराज ने राम नाम की महिमा और उसकी साधना का अत्यंत सरल, सहज और व्यावहारिक मार्ग हम सभी साधकों को प्रदान किया है। उनका दिया हुआ यह मार्ग हमारे जीवन को सही दिशा दिखाने वाला है। राम नाम केवल जाप करने का माध्यम नहीं, बल्कि मन की शुद्धि, आत्मिक शांति और प्रभु से जुड़ने का सरल साधन है।
हमें स्वामीजी महाराज की इस अमूल्य शिक्षा को केवल पढ़ना या सुनना ही नहीं चाहिए, बल्कि श्रद्धा, विश्वास और पूर्ण समर्पण भाव से अपने जीवन में उतारना चाहिए। जब साधक नियमित रूप से राम नाम का स्मरण करता है और अपने जीवन को नाम के सहारे चलाता है, तब धीरे-धीरे उसके विचार, भाव और कर्म भी उसी दिव्य नाम से प्रभावित होने लगते हैं।
उत्तम नाम अनाम का, राम नाम सुखकार। जिसे सिमर बहु जन तरे, भव सागर से पार।। १।।
आध्यात्मिक सम्बन्ध का मूल, हमारे सत्संग में श्री राम नाम है। इस मंगलमय राम नाम रूपी महामन्त्र के दान-आदान से ही हम आत्मा से एक दूसरे के समीपतर हो पाया करते हैं। यही महामधुर राम नाम हमारे सम्बन्ध को मनोहर और मीठा बनाता है।
राम नाम के उपासक की नाम साधना से प्रभु तुष्ट होते हैं और साधक के पापों को हर कर उसकी आत्मा में अमृत नाम की ही झंकार से प्रगट हो जाते हैं। साधक की मनोभावना ऐसी कि जैसे तन में औषधि काम करती है, ऐसी ही मेरे मानस रोगों का, मेरी चिन्ताओं को, मेरी चंचलताओं को दूर करने का काम श्री राम नाम आप ही कर रहा है। राम नाम रूप कल्पतरु का बीज मेरे हृदय की भूमि में बोया जा चुका है।
श्रद्धावान उपासक को श्री राम नाम केवल अक्षर राम शब्द ही प्रतीत नहीं होता। वह अपनी प्रीति से, अपनी श्रद्धा से, अपनी भावना से इसमें भगवान को ऐसे ही प्रतिष्ठित कर लेता है जैसे लोग मूर्ति में अपने देवता को प्रतिष्ठित कर लिया करते हैं।
नाम किसी भी चीज़ का रखा जाए तो उसका बोध होता है। नामोपासना में यह गहराई है कि नाम की ध्वनि अन्दर बस जाती है और साधक का मन मन्दिर बन जाता है। नाम की उपासना में बहुत सारी बाहर की सामग्री नहीं चाहिए।
‘अमृतवाणी’ और ‘श्री भक्ति प्रकाश’ राम नाम की महिमा से परिपूर्ण ग्रंथ हैं। इनमें राम नाम की महिमा से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण शिक्षाएँ इस प्रकार हैं:
अमृतवाणी श्लोक (८८): अपने हृदय को राम नाम से भर लो और राम नाम को ही अपना सच्चा धन मानकर संचित करो। अपने भीतर राम नाम को बसा लो और बाहरी आडंबर के बजाय मन को भीतर की ओर लगाकर राम नाम की पूजा और सिमरन करो।
अमृतवाणी श्लोक (७६): राम नाम ही सच्ची औषधि है। इसे प्रेम और श्रद्धा से जपने से मन के विकार दूर होते हैं और जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति का मार्ग खुलता है। राम नाम का अमृतमय रस पीने से मन शांत, निर्मल और स्थिर होता है तथा साधक परम शांति और निर्वाण की ओर बढ़ता है। राम नाम का अमृत जीवन के दुखों को दूर कर हमें परम शांति की ओर ले जाता है।
अमृतवाणी श्लोक (९): राम नाम की शक्ति इतनी महान है कि जिसने भी सच्चे मन से राम नाम का सिमरन किया, उसका जीवन बदल गया। बड़े से बड़े पापी और बुरे कर्म करने वाले भी राम नाम के सहारे सुधरकर भवसागर से पार हो गए। राम नाम मनुष्य के बुरे विचारों और कर्मों को दूर कर उसे सत्य और शांति के मार्ग पर ले जाता है।
भक्ति प्रकाश मंगलाचार पृष्ठ १, २
परमात्मा अपनी कृपा से हमें राम नाम प्रदान करते हैं। राम नाम का सिमरन करने से मनुष्य के पाप और बंधन दूर होते हैं और वह प्रभु के निकट पहुँचता है। राम नाम जपने से पाप और बंधन मिटते हैं और जीवन शुद्ध एवं मंगलमय बनता है।
भक्ति प्रकाश नाम की महिमा पृष्ठ ६०, ६१
राम का नाम ही सच्ची चिन्तामणि है। जैसे चिन्तामणि मनुष्य की इच्छाएँ पूरी करने वाली मानी जाती है, वैसे ही राम नाम साधक के जीवन को सही दिशा देकर उसके सबसे बड़े उद्देश्य—आत्मिक शांति और परमात्मा की अनुभूति—की ओर ले जाता है। श्री राम का नाम एक महामन्त्र है। इसलिए श्रद्धा और प्रेम से बार-बार “राम राम, श्री राम” का जाप करना चाहिए।
राम नाम का जाप सरल, सहज और सबके लिए संभव है। इसके लिए विशेष स्थान, समय या कठिन विधि आवश्यक नहीं। चलते-फिरते, काम करते हुए और अपने दैनिक जीवन में भी नाम का स्मरण किया जा सकता है।
राम नाम को केवल शब्दों के रूप में न दोहराएँ, बल्कि प्रेम, श्रद्धा और विश्वास के भाव से जपें। जीभ और होंठों से उच्चारण करते-करते धीरे-धीरे नाम मन में उतरने लगता है।
जब नाम का अभ्यास निरंतर होता है, तो धीरे-धीरे ऐसी अवस्था आती है कि बिना प्रयास के भी मन में राम नाम चलता रहता है—इसे अजपा जाप कहा जाता है। यह निरंतर नाम-स्मरण मन की अशुद्धियों, चिंताओं और विकारों को धोकर मन को निर्मल और शांत करता है।
श्री रामशरणम् का मूल संदेश
राम नाम को अपना सहारा बनाइए, प्रेम से उसका जाप कीजिए और जीवन के प्रत्येक कार्य में राम को याद रखिए। नियमित नाम-जाप से बाहरी परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, साधक का मन धीरे-धीरे भीतर से शांत, निर्मल और प्रभु के प्रति समर्पित होने लगता है। अंततः नाम जपने वाला और नाम का स्मरण करने वाला मन उसी राम-चेतना में स्थिर होने लगता है।
स्वामी जी ने समझाया कि राम अपने दिव्य नाम में ही विराजमान है।।