भक्त की भावना
स्वामी सत्यानंदजी महाराज ने 'श्री भक्ति प्रकाश' के "भक्त की भावना" नामक अध्याय में भक्त के स्वरूप और उसकी मनोदशा का अत्यंत विस्तार से वर्णन किया है। स्वामीजी महाराज कहते हैं कि जब कोई साधारण व्यक्ति स्वाध्याय, उपासना और ज्ञान प्राप्त कर लेता है; तथा पूरी लगन, श्रद्धा और अटूट विश्वास के साथ अपने मार्ग पर अडोल रहकर, पूरी निष्ठा, संयम, पूर्ण समर्पण और वैराग्य के साथ आगे बढ़ता है, तब वह 'भक्त' की श्रेणी में आ जाता है। इसके पश्चात, दुनिया और दुनियादारी को देखने का उसका पैमाना बदल जाता है—वह सबको एक रूप में देखता है और सत्य के मार्ग पर अग्रसर होता है।